रातकी मदहोशी सुना रहे थे हम

कुछ ख्वाबों मैं अब भी जी रहे थे हम ..........

पर अपनीही धुन मैं चले जा रहे है वोह

क्यों सुन ना सके क्या केह रहे थे हम.


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