कंहा वफ़ा का सिला देते है लोग
अब तो मोहब्बत की सजा देते है लोग
पहले सजाते है दिलो मैं चाहतों का ख्वाब
फिर एतबार को आग लगाते  है लोग.
मत ढूंढो जख्म के निशान जिस्म पे मेरे
हर चोट दिलपे देकर निकल जाते  है लोग
जिंदगीमे कुछ मजबूरियाँ, कुछ उल्झने बेशक होगी

पर चाहत  बुलंद हो तो , अपनों से दूर नहीं जा पाते  है लोग.

अनजान रास्ते पर मुड रही हूँ


पुरानी  पंक्तीया  बारबार दोहरा रही हूँ मै
यांदो के पीछे पीछे भाग रही हूँ मै
 पूंछो किसपर लिखी ये पंक्तिया मैंने ,
जबान दी है किसीको , निभा रही हूँ मै।
कितने हसीन पल छुट गए इन हातोंसे ,
कंहा उनका हिसाब अब जुटा पा रही हूँ मै
कैसे कैसे अर्थ लगायें हमारी चुपकियोंके ,
एक गहरा तुफान लबों में दबा रही हूँ मै
अब पलटकर नहीं जाना उस मोड़ पर कभी 
जंहा दफनाकर यांदो को अनजान रास्ते पर मुड रही हूँ मै।

कुछ सवाल




कुछ सवाल उठ रहे है जहन में ........
   के उनकी राह में नजरे बिछाये सादिया हुई
   ना कभी हम मिले उनसे ना वो हमसे,
फिर क्यों बेवजह गलीयो में हमारी बदनामिया हुयी? 

केह ना पाए किस तरहसे काटी तनहा राते हमने,
चुपकीया उनके लिये गलताफैमिया हुई।
बेराह भटकते रहे हजार रांहो पर हम, 
मंझीले छुट गयी हमसे, तो वो हमारी बेवफाईयां हुई।



इंतजार सुनी रांहो पर


छायी हुई खामोशी है
मन में एक उदासी है 
कट रही है शाम युंही 
साथ आज मायुसी भी है

दूर तक फैली तनहाई 
फिजा भी कुछ सहमीसी है 
ये किसने दी दस्तक ? या सिर्फ वहम हमारा
कोई पास आनेकी आहटसी है .

इंतजार सुनी रांहो पर 
मंझिले   अब  अंजानसी है
गुजर गये कितने कारवां यही से 
पर  एक तसवीर यांदो में धुंधलीसी है. 
माना के तेरी जिंदगी में अब हम शामिल नहीं,

मिल जायेंगी तुम्हे रोज राहे नयी.

पर एक बार तो कहते  झुठा ही सही,

के हर वक्त हमारी याद आती रही.
रातकी मदहोशी सुना रहे थे हम

कुछ ख्वाबों मैं अब भी जी रहे थे हम ..........

पर अपनीही धुन मैं चले जा रहे है वोह

क्यों सुन ना सके क्या केह रहे थे हम.


शाम की देहलीज़ पर बैठे रहे रातभर

तो हाल ए दिल आंखोसे कहा लब्जोमें कहा कुछभी नहीं

रातभर बिछाये मोती जिसपर वह कागज़ जब भेजा

.....तो लिखा उस पर कुछभी नहीं
तुम्हारी एक निगाह की बात है

पर हमारी जिंदगी का सवाल है

..........रख इतनी मेहर नज़र हमपर

वर्ना ए-जिंदगी, हमारे जिन्दा होने का सबूत क्या है!!!!!
इस कदर निगाहोंसे से देखते है वो

चाहत की प्यास जगाते है वो

दिलकी काशिश इधर भी है उधर भी

जानकर भी अनजानसे मुस्कुराते है वो