पुरानी पंक्तीया बारबार दोहरा रही हूँ मै।
यांदो के पीछे पीछे भाग रही हूँ मै।
न पूंछो किसपर लिखी ये पंक्तिया मैंने ,
जबान दी है किसीको , निभा रही हूँ मै।
कितने हसीन पल छुट गए इन हातोंसे ,
कंहा उनका हिसाब अब जुटा पा रही हूँ मै।
कैसे कैसे अर्थ लगायें हमारी चुपकियोंके ,
एक गहरा तुफान लबों में दबा रही हूँ मै।
अब पलटकर नहीं जाना उस मोड़ पर कभी
जंहा दफनाकर यांदो को अनजान रास्ते पर मुड रही हूँ मै।
No comments:
Post a Comment